तुम मेरे अंदर आए परिवर्तन का विश्लेषण कर रहे होगे
बहुत सारी बातें निष्कर्ष के तौर पर निकल रही होगी
कुछ वास्तविक और कुछ मस्तिष्क की कपोल कल्पना
निष्कर्ष कभी कभी परिणाम के समकक्ष कहीं नहीं टिकते, तुम निष्कर्षों को बोल सकते हो, इसलिए नहीं कि तुम बोलना चाहते हो.....इसलिए कि शायद तुम्हारे बोलने से किसी का प्रतिविम्ब प्रकट हो जाए.
कभी कभी मनुष्य स्वयं के प्रतिविंब को देख कर सुन कर ...अपना आत्मवलोकन करता है...और कभी कभी क्षणिक सत्यता के साथ खुश भी होता है.
स्वयं से वार्तालाप....
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