Thursday, September 8, 2016

स्वयं से वार्तालाप....

तुम मेरे अंदर आए परिवर्तन का विश्लेषण कर रहे होगे
बहुत सारी बातें निष्कर्ष के तौर पर निकल रही होगी
कुछ वास्तविक और कुछ मस्तिष्क की कपोल कल्पना
निष्कर्ष कभी कभी परिणाम के समकक्ष कहीं नहीं टिकते, तुम निष्कर्षों को बोल सकते हो, इसलिए नहीं कि तुम बोलना चाहते हो.....इसलिए कि शायद तुम्हारे बोलने से किसी का प्रतिविम्ब प्रकट हो जाए.
कभी कभी मनुष्य स्वयं के प्रतिविंब को देख कर सुन कर ...अपना आत्मवलोकन करता है...और कभी कभी क्षणिक सत्यता के साथ खुश भी होता है.

स्वयं से वार्तालाप....

प्रथम प्रेम-पाती




देह की घूमावदार लकदक , ललचा देने वाली, मन को मोह लेने वाली सौन्दर्य और वासना से कहीं कोसो दूर...........
बस झांकता हूँ आपकी आँखों में , जो इक समंदर सा एहसास देती है, आपके आँखों की मासूमीयत आपकी रूह़ में डूबकी लगाने का मौका देती है। अजीब सी कैफीयत तारी हो जाती है...जब मेरी रूह आपकी रूह में समा जाती है....शायद आपको इसका एहसास ना होता होगा.....। चाँद की चाँदनी में जुगनूं की क्या बिसात....।





य़कीन मानीए अब मैं ताउम्र इसी चाँदनी में जुगनूं बनकर तैरना चाहता हूँ।





कुछ चीजें , कुछ बातें हवा में तैरती रहती है....मेरा प्यार,मेरी मोहब्बत,मेरा इश्क भी बस आपकी रूह़ के चाँदनी हवाओं में तैर रहा है.. बस अब खुशबू की तरह आपके रूह़ के समन्दर में फना हो जाने की जुस्तजू़ रह गई है ।





देह की घूमावदार लकदक , ललचा देने वाली, मन को मोह लेने वाली सौन्दर्य और वासना से कहीं कोसो दूर..... .ये रूह़/आत्माओं का स्पर्श ही है जो अनंत काल तक प्रेम को जीवित रखती है।





तुम्हारा.....

Wednesday, April 27, 2016

पाकीज़ा ग़ूनाह

कुछ कहानियाँ यूँ ही गढी जाती है,कुछ बन जाती है, और कुछ कहानी बनाने के लिए आप अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं. जिंदगी थोड़ी अजीब है,और उससे भी अजीब इंसान की सोच ,इंसान की चाहत.
कुछ फलसफें है,कुछ रूहानीयत है,कुछ पाकिज़गी और कुछ गूनाह। मोहब्बत कब किससे,किस तरह हो जाए पता भी नहीं चलता।
किस तरह बयांँ करू अपने आप को,थोड़ी खुशी होती है, थोड़ी तकलीफ. खुद में परेशान हूँ, थोड़ा हैरान भी.
पता नहीं चलता जिंदगी के मोड़ पर खड़ा हूँ,या किसी किनारे पर। कि नदी के उस पार हूँ,कि नदी के इस पार हूँ. धारा के साथ हूँ कि धारा के विपरीत।यादों को साथ लिए जा रहा हूँ कि , यादें मुझसे छूट रहीं हैं, या आने वाली यादें मेरा इंतज़ार कर रही हैं।
कुछ कसक है, कुछ हँसी है, कुछ ग़म है. चाहता हूँ आप भी इस उलझन में मेरे साथी बने।पता नहीं ये साथ मेरी ज़िद है या आपकी खुशी। ,कुछ भी है रसभरी खट्टमिटठी ही है।
कभी कभी डर लगता है कि मैं अपनी हकीकत को बयाँ करूँ। बयाँ करूँ उन चीज़ों को जो मैंने अपने आप से छुपाएं है। डर लगता है कैसे हमराज़ बना लू ,जो खुद नहीं जानता उन राज़ों को। फिर भी कहता हूँ और कहने की हिम्मत रखता हूँ । किन मौंजू पर बोलूं, किसके लिए बोलूं. कि आज भी उसकी साँसे मेरी साँसों से टकराती हुई मालूम पड़ती है. आज भी उसका स्पर्श मुझे महसूस होता है. आज भी उसे देखकर दिल धड़कता है. वो दीगर बात है कि अब वो सपने में ही दिखता है. वो अलग बात है कि अब वो बारिश में ही आता है, वो भी यादों के साथ। हक़ीकी तौर पर देख पाऊंगा कि नहीं,पता नहीं।
कुछ ग़ूनाह था उस मोहब्बत में भी जो बंधन से बँधे हुए हैं. कुछ आकांक्षाए जो बंधन में बँधी हुई नहीं होती, गूनाह ही हो जाते हैं। अफसोस करूँ अपने आप पर कि फख्र करूँ, कि वो गूनाह मुझसे हो न पाए।कौन सी बातें थीं कौन सी नहीं, जो मैं कह नहीं पाया. बंधन तो है, बंधन तो रहेगा। कभी कभी परेशान होता हूँ कि भूल जाऊँगा मैं उसे, शायद कोशिश भी हमने भरपूर की है।
हालाते आखिरत की हैं बातें, कि क्या क्या सुनाऊँ मैं तुम्हें. जब प्यार आता है तो फ़ैज भी और फ़ैजान भी, सब मुर्शिद हो जाते हैं एक दूसरे के जब होती है आंखों में ग़ूनाहों का नशा। कभी कभी ओंठ काँपते हैं मोहब्बत को ग़ूनाह कहते कहते. कुछ भी नहीं समझ पाता कि ग़ूनाह क्या है और मोहब्बत क्या। ये ना जाने रूह की प्यास है कि जिस्म की, बस आँखों की ठंडक है या दिल का सुकून। जब आँखों से छुआ तो रूहानीयत थी, जब दिल से छुआ तो पाकीज़गी. जब जिस्म छू लिया तो क्या वो गूनाह हुआ।
अफसोस नहीं कि छु न पाए हम तुम्हें, अफसोस इस बात का भी नहीं कि  मिल ना पाएँगे हम फिर कभी.
जितना भी था, जैसा भी था, थोड़ी पाकीज़गी के साथ, थोड़े ग़ूनाह के साथ.....ये मेरी मोहब्बत ही थी...ये मेरी मोहब्बत ही थी...ये मेरी मोहब्बत ही थी।

Tuesday, April 19, 2016

राष्ट्र या स्वतंत्रता

राष्ट्र या स्वतंत्रता

राष्ट्र की अवधारणा के सन्दर्भ में  मेरे विचार भी संशय-पूर्ण  रहे हैं। लेकिन अपने विचारों  को उन्मुक्तता  के साथ रखने में थोड़ी झिझक होती हैं। स्वतंत्र राष्ट्र की परिकल्पना  ही बंधन और नियमावली के साथ शुरू होती है।  अगर राष्ट्र प्रेम में मानव मूल्य सम्महित न हो तो स्वतंत्रता कैसी? राष्ट्र कैसा ?

अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता भी राष्ट्र प्रेम में दब जाती है ,या दबा  दी जाती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वर्गीकरण भी समुदाय,वर्ग , जाती  के कपोल  कल्पित निष्ठा पर चिन्हित होता  है।  शायद यही  वजह  है की सार्वजनिक प्रतिक्रिया  देने के बजाय यहाँ व्यक्त करना  उचित समझा।

Sunday, April 3, 2016

बुरा न मानो होली है

मैंने  अपने  जीवन के ३० बसंत अभी हाल फिलहाल ही पुरे किये हैं. इन ३० बसंतो में से १८-२० बसंत जिन गली कूचों में पुरे किये। उसे आज बहुत मिस  कर रहा हूँ. अक्सर होली  में मैं चाहूँ  या न चाहूँ मेरे मित्र मुझे घसीट कर होली के हुड़दंग में  शामिल कर ही लेते थे.  मैं जिस परिवेश में पला बढ़ा हूँ वहां  मुझे ईद ,बकरीद के साथ होली दिवाली दशहरा भी मनाने को मिला. ईद बकरीद में मेरे घर पर जो मेहमान आते थे उनमे से 90 प्रतिशत  (पडोसी और दोस्त )हिन्दू  हुआ   करते थे।  और जिस प्रेम और विश्वास के साथ ईद में हमसे मिलने आते थे उससे अपने मूल घर से दूर पराये राज्य में भी नाते  रिश्तेदारो  की  कमी नहीं  खलती थी. और इसके एवज़ में हमारे घर पर  हमे  पुरे मोहल्ले से होली दिवाली छठ पे ठेकुआ , गुजिया, मठरी , मिठाइयां  और  न जाने कितने  तरह के पकवान आते थे. की लगता था  की होली हमारे घर पर हि मन रही है.

ये तो रही घर पर आने वाले पकवानो की बात , होली  के दिन जो दावतों  का सिलसिला दोपहर से शुरू होता था , रात के 8-9  बजे तक चलता रहता. मेरे पापा जो कि अनुशाषन के  प्रति  काफी सख्त थे , होली के दिन घर पर देर रात आने की हमारी ये गलती नज़रअंदाज़ कर  दी जाती थी।

दिन भर दोस्तों के साथ भूत बन कर धमाचौकड़ी करने के बाद देर  रात,  अम्मी के  डांट डपट के  बीच चेहरे से रंग छुड़ाने का कार्यक्रम चालू रहता।

इतना ऊधम कूद मचाने और लगभग पुरे मोहल्ले  छप्पनभोग खाने के बाद भी मन नहीं मन नहीं भरता  था , अम्मी  के क्लिष्ट शब्द बाणों के बीच  किचन  और फ्रिज का सर्च ऑपरेशन चालू रहता।  खैर इस धमाचौकड़ी की सजा सुबह सुबह संडास में पीले  पानी की तेज़ धारा  के रूप मिल ही  जाती थी।  और पुदीन हरा की हरी गोलियों के साथ होली का समापन हो जाता  था.


एक बात और अगले  दिन नमाज़ के लिए  मस्जिद जाते वक़्त ,मेरी कानो की लौ के नीचे लगे लाल हरे रंग को देख जुग्गु मियां , जान मोहम्मद , कल्लू मिस्त्री  की भृकुटी तन जाती थी , सवालिया निशान बनाते हुए उनके चेहरे मुझपर कुफ्र  और मुनफ़िक़त का  इलज़ाम लगते हुए  दिखते  थे ... और मैं मुस्कुराता हुआ विजयी भाव से जमात की पहली सफ में शामिल हो जाता था. और मस्जिद के ठीक  बाहर जुग्गु मियां , जान मोहम्मद , कल्लू मिस्त्री के ताश के पत्ते और चाल बदस्तूर जारी रहते.

बुरा न मानो होली  है.






सहिस्णुता और असहिस्णुता !!

सहिस्णुता  और असहिस्णुता !!



पता नहीं ऐसा क्यों है, सहिस्णुता  और असहिस्णुता के बहस को देखते देखते दिमाग़ का दही हो गया है. कोई भी कुछ भी बोल देता है उसके बाद तथाकथित बुध्ध्जिवी दो खेमो में बँट  जाते है , अपनी भाड़ मिडिया को मसाला मिल जाता है , कोई  पक्ष और विपक्ष में !! उसके बाद तथाकथित बुध्ध्जिवी दो खेमो में बँट  जाते है , अपनी भाड़ मिडिया को मसाला मिल जाता है , कोई  पक्ष और विपक्ष में !! ( विपक्ष का भी आखिरकार मत होता है). फेसबुक के पोस्ट देखते देखते स्वयं के अंदर भी विचार उत्पन्न होते हैं... हो सकता है ये विचार निस्पक्ष न हो.... फिर भी विचार ही है. हमारी भारतीय मानसिकता विचारों के उत्पन्न होने की पूरी स्वतंत्रतता देती है... ...कोई बाध्यता नहीं है। 



 परन्तु प्रश्न ये की, इन उत्पन्न विचारो के कोहरे में यथार्थ के प्रश्न कहीं धूमिल हो जाते हैं.
मेरी भी उँगलियों में कुलबुलाहट होती है... चाहता हूँ की विचारो के अन्तर्दवंद से बचा रहूँ,  काफी यत्न के बाद भी नहीं बच पाता। अपने अधकचरे तार्किक विचारो को फेसबुक पर शेयर करके सहिस्णुता और असहिस्णुता के भेड़चाल वाली बुद्धिजीवियों के बहस में कूद पड़ता  हूँ। .. साथ ही ये एक ऐसा खुला आमंत्रण  होता है जिसमे आप खुद को और अपने दोस्तों को सहिस्णु / असहिस्णु के मकड़जाल में खींच लाते हैं.
और ये मकड़जाल आपको मोदीविरोधी और मोदीभक्त के अलंकार तक ले आते हैं. ऊपर से अगर आप मुल्ले हुए तो भाई मोदीविरोधी /मोदीभक्त  के नए पर्याय राष्ट्रद्रोही / राष्ट्रभक्त तक अलंकृत किये जा सकते है. खैर निजी तौर पर मुझे ज्यादा परेशानी नहीं होती.. पर पीड़ा देने वाली बात ये होती की इस मकड़जाल बहस में किसी मित्र को खो देने का डर  बना रहता है, और इसी डर से मै एक  भारतीय-मुल्ला, विचारो की स्वतंत्रता को व्यक्त करने से परहेज करता हूँ। मेरा कोई भी मित्र मोदीभक्त / मोदीविरोधी हो सकता है। .... इससे किसी के देश भक्ति का पैमाना नहीं नापा जा सकता।  ठीक उसी तरह मेरे अधकचरे मोदीविरोधी तार्किक विचारो के आधार पर मुझे राष्ट्रद्रोही / राष्ट्रभक्त नहीं कहा जा सकता।
                                                    


हमें नहीं भूलना चाहिए की इस  मकड़जाल बहस में हम यथार्थ के प्रश्नो को भूलते जा रहे है... अरहर की दाल की क़ीमत के अलावा भी बहुत से प्रश्न है, जिस पर सम्पूर्ण देशवासियों विशेषकर हम युवा पीढ़ी को धर्म, पंथ, क्षेत्रवाद, जातिवाद और ऐसे ही न जाने कितने ही निरर्थक विषयों  से बाहर निकल कर एक समतामूलक,उज्जवल, चेतनापूरक प्रगितिशील और विकसित भारतीय समाज की रचना करना है. #MAKEININDIA #INDIAAGAINSTCORRUPTION  #PROUDTOBEINDIAN .
 
अगर हम स्वयं के अंदर चल रहे इन सहिस्णुता और असहिस्णुता जैसे व्यर्थ विषयों के वैचारिक द्वन्द को समाप्त न कर पाये। . तो धरातल पर उभरे वास्तविक द्वन्द के परिणाम अकल्पनीय होगें।

ज़िन्दगी की मिठास

 






कुछ उलझा हुआ सा लगता है ,मन स्थिर नहीं है, चित्त शांत नहीं है। ऐसा लगता है कहीं न कहीं , कुछ न कुछ कोई गलती तो हुई है। ऐसा नहीं की वो नज़र नहीं आती ,नज़र तो आती है लेकिन क्या करे नज़रअंदाज़ करने की आदत जो हो गई है. आख़िरकार अपने अंदर के लालच को दिखा ही दिया। खुद को अच्छा दिखते दिखाते दूसरों की अहमीयत को नज़रअंदाज़ कर बैठे। गलती तो हुई है लालच जाग उठा मन मे ,दूसरों का दुःख नहीं समझ पाये तुम। वो दूसरे जो शायद तुम्हारे अपने ही है। वो दूसरे जो तुम्हारी जीवन के कठिन पलों में तुम्हारे साथ थे। इतने कठोर ना बनो। जो गर्व अपनी बातों और व्यवहार में दिखलाते हो , उसे अपने कर्म में अपनाओ। त्याग से इंसान ख़त्म नहीं होता ,महान हो जाता है। ये त्याग कोई उपकार या बदला नहीं ,किसी के ऊपर एहसान नहीं, वस्तुतःतुम्हे करना ही था। 
   
आसमान में उड़ने की कला जानने वाले भी आकाश में घर नहीं बना सकते , फिर तुमने तो बस पंख फफड़फड़ाना ही सीखा है। सच्चाइयाँ कड़वी होती है। जो उनसे भागते हैं ,उसका कड़वापन उन्हें कभी नहीं छोड़ता है। सच्चाई को आत्मसात कर लो , ज़िन्दगी की मिठास उसी कड़वेपन में हैं। कभी कभी खुद को डांट लेना ,दिल खोलकर रो लेना। शायद ये डांट और रोना उनसे न मिले ,जिनसे तुम अंजाने में ही दूर भाग रहे हो।

.