सहिस्णुता और असहिस्णुता !!
पता नहीं ऐसा क्यों है, सहिस्णुता और असहिस्णुता के बहस को देखते देखते दिमाग़ का दही हो गया है. कोई भी कुछ भी बोल देता है उसके बाद तथाकथित बुध्ध्जिवी दो खेमो में बँट जाते है , अपनी भाड़ मिडिया को मसाला मिल जाता है , कोई पक्ष और विपक्ष में !! उसके बाद तथाकथित बुध्ध्जिवी दो खेमो में बँट जाते है , अपनी भाड़ मिडिया को मसाला मिल जाता है , कोई पक्ष और विपक्ष में !! ( विपक्ष का भी आखिरकार मत होता है). फेसबुक के पोस्ट देखते देखते स्वयं के अंदर भी विचार उत्पन्न होते हैं... हो सकता है ये विचार निस्पक्ष न हो.... फिर भी विचार ही है. हमारी भारतीय मानसिकता विचारों के उत्पन्न होने की पूरी स्वतंत्रतता देती है... ...कोई बाध्यता नहीं है।
परन्तु प्रश्न ये की, इन उत्पन्न विचारो के कोहरे में यथार्थ के प्रश्न कहीं धूमिल हो जाते हैं.
मेरी भी उँगलियों में कुलबुलाहट होती है... चाहता हूँ की विचारो के अन्तर्दवंद से बचा रहूँ, काफी यत्न के बाद भी नहीं बच पाता। अपने अधकचरे तार्किक विचारो को फेसबुक पर शेयर करके सहिस्णुता और असहिस्णुता के भेड़चाल वाली बुद्धिजीवियों के बहस में कूद पड़ता हूँ। .. साथ ही ये एक ऐसा खुला आमंत्रण होता है जिसमे आप खुद को और अपने दोस्तों को सहिस्णु / असहिस्णु के मकड़जाल में खींच लाते हैं.
और ये मकड़जाल आपको मोदीविरोधी और मोदीभक्त के अलंकार तक ले आते हैं. ऊपर से अगर आप मुल्ले हुए तो भाई मोदीविरोधी /मोदीभक्त के नए पर्याय राष्ट्रद्रोही / राष्ट्रभक्त तक अलंकृत किये जा सकते है. खैर निजी तौर पर मुझे ज्यादा परेशानी नहीं होती.. पर पीड़ा देने वाली बात ये होती की इस मकड़जाल बहस में किसी मित्र को खो देने का डर बना रहता है, और इसी डर से मै एक भारतीय-मुल्ला, विचारो की स्वतंत्रता को व्यक्त करने से परहेज करता हूँ। मेरा कोई भी मित्र मोदीभक्त / मोदीविरोधी हो सकता है। .... इससे किसी के देश भक्ति का पैमाना नहीं नापा जा सकता। ठीक उसी तरह मेरे अधकचरे मोदीविरोधी तार्किक विचारो के आधार पर मुझे राष्ट्रद्रोही / राष्ट्रभक्त नहीं कहा जा सकता।
अगर हम स्वयं के अंदर चल रहे इन सहिस्णुता और असहिस्णुता जैसे व्यर्थ विषयों के वैचारिक द्वन्द को समाप्त न कर पाये। . तो धरातल पर उभरे वास्तविक द्वन्द के परिणाम अकल्पनीय होगें।
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