कुछ कहानियाँ यूँ ही गढी जाती है,कुछ बन जाती है, और कुछ कहानी बनाने के लिए आप अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं. जिंदगी थोड़ी अजीब है,और उससे भी अजीब इंसान की सोच ,इंसान की चाहत.
कुछ फलसफें है,कुछ रूहानीयत है,कुछ पाकिज़गी और कुछ गूनाह। मोहब्बत कब किससे,किस तरह हो जाए पता भी नहीं चलता।
किस तरह बयांँ करू अपने आप को,थोड़ी खुशी होती है, थोड़ी तकलीफ. खुद में परेशान हूँ, थोड़ा हैरान भी.
पता नहीं चलता जिंदगी के मोड़ पर खड़ा हूँ,या किसी किनारे पर। कि नदी के उस पार हूँ,कि नदी के इस पार हूँ. धारा के साथ हूँ कि धारा के विपरीत।यादों को साथ लिए जा रहा हूँ कि , यादें मुझसे छूट रहीं हैं, या आने वाली यादें मेरा इंतज़ार कर रही हैं।
कुछ कसक है, कुछ हँसी है, कुछ ग़म है. चाहता हूँ आप भी इस उलझन में मेरे साथी बने।पता नहीं ये साथ मेरी ज़िद है या आपकी खुशी। ,कुछ भी है रसभरी खट्टमिटठी ही है।
कभी कभी डर लगता है कि मैं अपनी हकीकत को बयाँ करूँ। बयाँ करूँ उन चीज़ों को जो मैंने अपने आप से छुपाएं है। डर लगता है कैसे हमराज़ बना लू ,जो खुद नहीं जानता उन राज़ों को। फिर भी कहता हूँ और कहने की हिम्मत रखता हूँ । किन मौंजू पर बोलूं, किसके लिए बोलूं. कि आज भी उसकी साँसे मेरी साँसों से टकराती हुई मालूम पड़ती है. आज भी उसका स्पर्श मुझे महसूस होता है. आज भी उसे देखकर दिल धड़कता है. वो दीगर बात है कि अब वो सपने में ही दिखता है. वो अलग बात है कि अब वो बारिश में ही आता है, वो भी यादों के साथ। हक़ीकी तौर पर देख पाऊंगा कि नहीं,पता नहीं।
कुछ ग़ूनाह था उस मोहब्बत में भी जो बंधन से बँधे हुए हैं. कुछ आकांक्षाए जो बंधन में बँधी हुई नहीं होती, गूनाह ही हो जाते हैं। अफसोस करूँ अपने आप पर कि फख्र करूँ, कि वो गूनाह मुझसे हो न पाए।कौन सी बातें थीं कौन सी नहीं, जो मैं कह नहीं पाया. बंधन तो है, बंधन तो रहेगा। कभी कभी परेशान होता हूँ कि भूल जाऊँगा मैं उसे, शायद कोशिश भी हमने भरपूर की है।
हालाते आखिरत की हैं बातें, कि क्या क्या सुनाऊँ मैं तुम्हें. जब प्यार आता है तो फ़ैज भी और फ़ैजान भी, सब मुर्शिद हो जाते हैं एक दूसरे के जब होती है आंखों में ग़ूनाहों का नशा। कभी कभी ओंठ काँपते हैं मोहब्बत को ग़ूनाह कहते कहते. कुछ भी नहीं समझ पाता कि ग़ूनाह क्या है और मोहब्बत क्या। ये ना जाने रूह की प्यास है कि जिस्म की, बस आँखों की ठंडक है या दिल का सुकून। जब आँखों से छुआ तो रूहानीयत थी, जब दिल से छुआ तो पाकीज़गी. जब जिस्म छू लिया तो क्या वो गूनाह हुआ।
अफसोस नहीं कि छु न पाए हम तुम्हें, अफसोस इस बात का भी नहीं कि मिल ना पाएँगे हम फिर कभी.
जितना भी था, जैसा भी था, थोड़ी पाकीज़गी के साथ, थोड़े ग़ूनाह के साथ.....ये मेरी मोहब्बत ही थी...ये मेरी मोहब्बत ही थी...ये मेरी मोहब्बत ही थी।
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