मैंने अपने जीवन के ३० बसंत अभी हाल फिलहाल ही पुरे किये हैं. इन ३० बसंतो में से १८-२० बसंत जिन गली कूचों में पुरे किये। उसे आज बहुत मिस कर रहा हूँ. अक्सर होली में मैं चाहूँ या न चाहूँ मेरे मित्र मुझे घसीट कर होली के हुड़दंग में शामिल कर ही लेते थे. मैं जिस परिवेश में पला बढ़ा हूँ वहां मुझे ईद ,बकरीद के साथ होली दिवाली दशहरा भी मनाने को मिला. ईद बकरीद में मेरे घर पर जो मेहमान आते थे उनमे से 90 प्रतिशत (पडोसी और दोस्त )हिन्दू हुआ करते थे। और जिस प्रेम और विश्वास के साथ ईद में हमसे मिलने आते थे उससे अपने मूल घर से दूर पराये राज्य में भी नाते रिश्तेदारो की कमी नहीं खलती थी. और इसके एवज़ में हमारे घर पर हमे पुरे मोहल्ले से होली दिवाली छठ पे ठेकुआ , गुजिया, मठरी , मिठाइयां और न जाने कितने तरह के पकवान आते थे. की लगता था की होली हमारे घर पर हि मन रही है.
ये तो रही घर पर आने वाले पकवानो की बात , होली के दिन जो दावतों का सिलसिला दोपहर से शुरू होता था , रात के 8-9 बजे तक चलता रहता. मेरे पापा जो कि अनुशाषन के प्रति काफी सख्त थे , होली के दिन घर पर देर रात आने की हमारी ये गलती नज़रअंदाज़ कर दी जाती थी।
दिन भर दोस्तों के साथ भूत बन कर धमाचौकड़ी करने के बाद देर रात, अम्मी के डांट डपट के बीच चेहरे से रंग छुड़ाने का कार्यक्रम चालू रहता।
इतना ऊधम कूद मचाने और लगभग पुरे मोहल्ले छप्पनभोग खाने के बाद भी मन नहीं मन नहीं भरता था , अम्मी के क्लिष्ट शब्द बाणों के बीच किचन और फ्रिज का सर्च ऑपरेशन चालू रहता। खैर इस धमाचौकड़ी की सजा सुबह सुबह संडास में पीले पानी की तेज़ धारा के रूप मिल ही जाती थी। और पुदीन हरा की हरी गोलियों के साथ होली का समापन हो जाता था.
एक बात और अगले दिन नमाज़ के लिए मस्जिद जाते वक़्त ,मेरी कानो की लौ के नीचे लगे लाल हरे रंग को देख जुग्गु मियां , जान मोहम्मद , कल्लू मिस्त्री की भृकुटी तन जाती थी , सवालिया निशान बनाते हुए उनके चेहरे मुझपर कुफ्र और मुनफ़िक़त का इलज़ाम लगते हुए दिखते थे ... और मैं मुस्कुराता हुआ विजयी भाव से जमात की पहली सफ में शामिल हो जाता था. और मस्जिद के ठीक बाहर जुग्गु मियां , जान मोहम्मद , कल्लू मिस्त्री के ताश के पत्ते और चाल बदस्तूर जारी रहते.
बुरा न मानो होली है.
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