Tuesday, April 19, 2016

राष्ट्र या स्वतंत्रता

राष्ट्र या स्वतंत्रता

राष्ट्र की अवधारणा के सन्दर्भ में  मेरे विचार भी संशय-पूर्ण  रहे हैं। लेकिन अपने विचारों  को उन्मुक्तता  के साथ रखने में थोड़ी झिझक होती हैं। स्वतंत्र राष्ट्र की परिकल्पना  ही बंधन और नियमावली के साथ शुरू होती है।  अगर राष्ट्र प्रेम में मानव मूल्य सम्महित न हो तो स्वतंत्रता कैसी? राष्ट्र कैसा ?

अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता भी राष्ट्र प्रेम में दब जाती है ,या दबा  दी जाती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वर्गीकरण भी समुदाय,वर्ग , जाती  के कपोल  कल्पित निष्ठा पर चिन्हित होता  है।  शायद यही  वजह  है की सार्वजनिक प्रतिक्रिया  देने के बजाय यहाँ व्यक्त करना  उचित समझा।

No comments:

Post a Comment