Sunday, April 3, 2016

ज़िन्दगी की मिठास

 






कुछ उलझा हुआ सा लगता है ,मन स्थिर नहीं है, चित्त शांत नहीं है। ऐसा लगता है कहीं न कहीं , कुछ न कुछ कोई गलती तो हुई है। ऐसा नहीं की वो नज़र नहीं आती ,नज़र तो आती है लेकिन क्या करे नज़रअंदाज़ करने की आदत जो हो गई है. आख़िरकार अपने अंदर के लालच को दिखा ही दिया। खुद को अच्छा दिखते दिखाते दूसरों की अहमीयत को नज़रअंदाज़ कर बैठे। गलती तो हुई है लालच जाग उठा मन मे ,दूसरों का दुःख नहीं समझ पाये तुम। वो दूसरे जो शायद तुम्हारे अपने ही है। वो दूसरे जो तुम्हारी जीवन के कठिन पलों में तुम्हारे साथ थे। इतने कठोर ना बनो। जो गर्व अपनी बातों और व्यवहार में दिखलाते हो , उसे अपने कर्म में अपनाओ। त्याग से इंसान ख़त्म नहीं होता ,महान हो जाता है। ये त्याग कोई उपकार या बदला नहीं ,किसी के ऊपर एहसान नहीं, वस्तुतःतुम्हे करना ही था। 
   
आसमान में उड़ने की कला जानने वाले भी आकाश में घर नहीं बना सकते , फिर तुमने तो बस पंख फफड़फड़ाना ही सीखा है। सच्चाइयाँ कड़वी होती है। जो उनसे भागते हैं ,उसका कड़वापन उन्हें कभी नहीं छोड़ता है। सच्चाई को आत्मसात कर लो , ज़िन्दगी की मिठास उसी कड़वेपन में हैं। कभी कभी खुद को डांट लेना ,दिल खोलकर रो लेना। शायद ये डांट और रोना उनसे न मिले ,जिनसे तुम अंजाने में ही दूर भाग रहे हो।

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